| 000 | 04209nam a2200253Ia 4500 | ||
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| 041 | _aHindi | ||
| 082 |
_a891.43 _bSHA |
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| 100 | _aसुरेश शर्मा | ||
| 100 | _q"Sharma, Suresh" | ||
| 245 | 0 | _aरघुवीर सहाय रचनावली (6 वाल्यूम सेट) : वॉल्यूम - 1 | |
| 245 | 0 | _bRaghuveer sahay rachanawali (6 Vol Set) : Vol -1 | |
| 245 | 0 | _cEd. Suresh Sharma | |
| 260 | _aNew Delhi | ||
| 260 | _bRajkamal Prakashan | ||
| 260 | _c2013 | ||
| 300 | _a538p. | ||
| 505 |
_tRaghuveer sahay rachanawali : Vol -1 _tRaghuveer sahay rachanawali : Vol -2 _tRaghuveer sahay rachanawali : Vol -3 _tRaghuveer sahay rachanawali : Vol -4 _tRaghuveer sahay rachanawali : Vol -5 _tRaghuveer sahay rachanawali : Vol -6 |
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| 520 | _aरघुवीर सहाय की रचनाएँ आधुनिक समय की धड़कनों का जीवन्त दस्तावेज़ हैं। इसीलिए छह खंडों में प्रकाशित उनकी रचनावली में आज का समय सम्पूर्णता में परिभाषित हुआ है। अपनी अद्वितीय सर्जनशीलता के कारण रघुवीर सहाय ऐसे कालजयी रचनाकारों में हैं जिनकी प्रासंगिकता समय बीतने के साथ बढ़ती ही जाती है। ‘फिर उन्हीं लोगों से’ शीर्षक रचनावली के इस पहले खंड में रघुवीर सहाय की 1946 से 1990 तक की प्रकाशित-अप्रकाशित सम्पूर्ण कविताएँ संकलित हैं। इस खंड में शामिल कविता-संग्रहों के नाम हैं : ‘सीढ़ियों पर धूप में’ (1960), ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ (1967), ‘हँसो, हँसो जल्दी हँसो’ (1975 ), ‘लोग भूल गए हैं’ (1982), ‘कुछ पते कुछ चिट्ठियाँ ‘ (1989) तथा ‘एक समय था’ (1995)। इन संग्रहों के अलावा बाद में मिली कुछ नई अप्रकाशित कविताएँ भी इस खंड में हैं। संग्रह के परिशिष्ट में ‘यह दुनिया बहुत बड़ी है, जीवन लम्बा है’, शीर्षक से रघुवीर सहाय की सैकड़ों आरम्भिक कविताएँ संकलित हैं। रघुवीर सहाय ने अपने जीवनकाल में ही अपनी आरम्भिक कविताओं का संग्रह तैयार किया था, लेकिन अब तक यह अप्रकाशित था। कवि के काव्य-विकास को समझने की दृष्टि से यह सामग्री अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। परिशिष्ट में ही रघुवीर सहाय की बरस-दर-बरस ज़िन्दगी का ख़ाक़ा और सैकड़ों वर्षों का उनका वंश-वृक्ष भी दिया गया है। अपने नए कथ्य और शिल्प के कारण रघुवीर सहाय ने हिन्दी कविता को नया रूप दिया है। इस खंड की कविताओं में आप उस नए रूप को आसानी से पहचान सकते हैं। | ||
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